शीला की लीला – 20 | Hindi Sex Story

खाना खतम कर शीला बाहर बरामदे में बैठ गई.. संजय भी आकर उसके बगल में बैठ गया.. तभी वहाँ पीयूष आया.. रात के दस बज रहे थे.. पीयूष के पीछे पीछे कविता, मौसम और फाल्गुनी भी आए.. पूरा घर भर गया.. इन सब के आने से शीला को बहोत अच्छा लगा.. इन सब की मौजूदगी में संजय कुछ भी उल्टा सीधा नहीं कर पाएगा.. दूसरी तरफ संजय अफसोस कर रहा था.. हाथ में आया हुआ गोल्डन चांस चला गया..

पीयूष को देखते ही वैशाली के चेहरे पर चमक आ गई.. पीयूष शीला भाभी की बगल में बैठ गया और वैशाली उसके बाजू में.. कविता को ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा.. पर वो कर भी क्या सकती थी !! पीयूष की दोनों तरफ उसकी दोनों पसंदीदा प्रेमिकाएं बैठी थी.. दोनों पर वो हाथ साफ कर चुका था.. दोनों के स्तनों की साइज़ जरूर अलग अलग थी पर उत्तेजना एक सी ही थी.. उस दिन मूवी देखकर लौटने के बाद जब वो चाबी देने आया तब शीला ने जिस हवस का प्रदर्शन किया था.. और वहाँ खंडहर में रेत के ढेर पर वैशाली जिस तरह उस पर सवार हो गई थी.. माँ और बेटी दोनों की वासना एक बराबर थी.. पीयूष के दोनों हाथों में लड्डू थे..

पीयूष को दोनों के बीच बैठ देखकर कविता जल कर खाक हो गई.. रेणुका से बात करने के बाद शीला भाभी की जो अच्छी छवि उसके मन में बनी थी वह एक ही पल में ध्वस्त हो गई.. अपने पति के पास बैठकर हंस हँसकर बातें कर रही शीला को देखकर बहोत गुस्सा आया उसे.. बातों बातों म एन वैशाली ने हँसकर पीयूष के हाथ पर ताली दी.. कविता के मन में जल रही आग में जैसे किसी ने पेट्रोल डाल दिया.. कविता की शक्ल रोने जैसी हो गई.. पर वैशाली या शीला.. दोनों में से किसी ने भी कविता की तरफ ध्यान नहीं दिया.. सब अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. संजय कोने में बैठकर सिगरेट फूँकते हुए मौसम के नाइट ड्रेस से दिख रही ब्रा की पट्टी को देख रहा था..

कविता को इतना गुस्सा आया की उसका बस चलता तो अभी पीयूष को खींचकर घर ले जाती.. पर वो क्या कर सकती थी!!! और हकीकत तो यह थी की शीला उसके बगल में आकर नहीं बैठी थी.. खुद पीयूष ही जाकर उनके पास बैठ गया था.. जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरों को क्या दोष देना ? कुछ समय से बहोत बिगड़ गया है ये पीयूष.. वैशाली के आने के बाद कुछ ज्यादा ही नखरे बढ़ गए है इसके.. कविता का दिमाग घूम रहा था.. जब दिमाग में शक का कीड़ा एक बार घुस गया तो उसे बाहर निकालना बहोत कठिन हो जाता है.. कविता की मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं थी.. लेकिन तभी पीयूष ने कुछ ऐसा कहा जिससे कविता का रोम रोम पुलकित हो उठा.. उदास कविता के मन में जो मुकेश के दर्द भरे नगमे चल रहे थे.. उसके स्थान पर मनहर उधास की रोमेन्टीक ग़ज़ल बजने लगी..

पीयूष ने कहा की राजेश सर की वाइफ का बर्थडे आ रहा था और वोह कंपनी के पूरे स्टाफ को टूर पर ले जाना चाहते थे..

पीयूष: “मैंने उनसे गुरुवार और शुक्रवार की छुट्टी मांगी तो उन्होंने इस टूर के बारे में बताया और कहा की मैं मौसम और फाल्गुनी को भी साथ ले लूँ.. मैंने हाँ बोल दिया है.. तो हम कल सुबह सात बजे ऑफिस के बाहर मिलने वाले है.. तू साथ चलेगी ना वैशाली?”

पीयूष को वैशाली के प्रति आकर्षित होता देख उसे पीटने का मन कर रहा था कविता का.. पर मन ही मन वो रेणुका को थेंक्स बोल रही थी.. उनके कारण ही यह मुमकिन हो पाया.. और अब पिंटू भी शीला भाभी के चंगुल में नहीं फँसेगा.. सब सही हो रहा था.. रेणुका वाकई बड़े काम की चीज है.. चुतकी बजाते मेरा प्रॉब्लेम सॉल्व कर दिया।।

कविता: “लेकिन पीयूष, बाहर के लोगों के लिए जगह होगी भी?” वैशाली को नीचा दिखाने का मौका मिल गया कविता को.. लेकिन उसके यह बोलने से वैशाली को कुछ फरक नहीं पड़ा

पीयूष ने बड़े उत्साह के साथ कहा.. “अरे, राजेश सर ने बड़ी वाली बस मँगवाई है.. कम से कम १० सीट खाली रहेगी.. अगर शीला भाभी चलना चाहें तो वो भी आ सकती है.. ” पीयूष को दोनों हाथों में लड्डू चाहिए थे.. पर कविता भी कम नहीं थी

कविता: “फिर तो हम संजय कुमार को भी साथ ले लेते है.. वह भी हमारे मेहमान है.. हम सब जाएँ और वो यहाँ अकेले रहे तो अच्छा नहीं लगेगा.. ” कविता की इस गुगली के आगे सारे बेटसमेन अपनी विकेट बचाने में लग गए। कविता जानती थी की संजय की मौजूदगी में वैशाली या शीला दोनों अपनी हद में रहेंगे.. और उसके पति को उन दोनों से दूर रख पाएगी.. और अगर नजर बचाकर शीला भाभी थोड़ा बहोत कुछ कर भी लेती है तो कोई हर्ज नहीं है.. मैं भी उस दौरान पिंटू के साथ मजे कर लूँगी.. वैसे भी शीला भाभी अब ५-६ दिन की मेहमान थी.. मदन भाई के लौटने के बाद यह खिलाड़ी रिटायर्ड हर्ट होकर पेवेलियन लौट जाने वाला था.. वाह.. खुद की पीठ थपथपाने का मन हो रहा था कविता को

संजय को शामिल करने की बात सुनते ही पीयूष बॉखला गया.. सिर्फ उस आदमी की मौजूदगी से पूरी टूर का सत्यानाश हो जाएगा.. वैशाली और शीला के संग गुलछरों का आनंद लेने का सपना टूटता हुआ दिखा.. वैसे रेणुका भी साथ चलने वाली थी पर राजेश सर के साथ रहते हुए उनके करीब जाने की सोच भी नहीं सकता था पीयूष.. अगले दिन रेणुका की हवस देखकर उतना तो तय था की टूर के दौरान एकाध किस करने या बबले दबाने का मौका तो मिल ही जाएगा उसके साथ..

इन सारे प्रपंचों से अनजान मौसम और फाल्गुनी अंताक्षरी खेल रहे थे..

मौसम अपनी सुरीली आवाज में गा रही थी “ये दिल तुम बिन.. कहीं.. लगता नहीं, हम क्या करें.. !!” वह इतना सुरीला गा रही थी की बाकी बैठे सब चुप होकर उसके गीत को सुनने लगे.. शीला को मदन की याद आ गई.. सब से नजर बचाते हुए उसने अपने गाल से आँसू पोंछ लिए..

सुरीले मुखड़े के बाद मौसम अब अंतरा गा रही थी

“बुझा दो, आग दिल की या उसे खुल कर हवा दे दो.. जो उसका मोल दे पाए, उसे अपनी वफ़ा दे दो..
तुम्हारे दिल में क्या है बस, हमे इतना पता दे दो.. के अब तन्हा सफर कटता नहीं, हम क्या करें.. “

गीत खतम होते ही सब ने तालियों से उसे नवाजा.. “वाह वाह मौसम.. बहोत बढ़िया.. कितना अच्छा गाती हो तुम” अपनी छोटी बहन की तारीफ सुनकर कविता गदगद हो गई.. तभी संजय उठकर मौसम के पास आया और वॉलेट से ५०० का नोट निकालकर मौसम को देते हुए बोला

संजय: “वाह मौसम वाह.. तेरे कंठ में तो साक्षात सरस्वती बिराजमान है.. बुरा मत मानना.. ये कोई बखशीश नहीं है.. बस देवी के चरण में भक्त की भेंट अर्पण कर रहा हूँ.. ऐसी सुंदर गायकी की कदर तो होनी ही चाहिए”

मौसम ने शरमाते हुए कहा “अगर पैसे न लूँ तो आपका अपमान होगा.. लेकिन इस कुदरत की देन का व्यापार करना मुझे ठीक नहीं लगता.. बाकी दीदी जैसा कहेंगी मैं वैसा ही करूंगी”

कविता ने सोचकर कहा “देख मौसम, जीवन की पहली कमाई हम परिवार पर खर्च करते है.. हम भी एक परिवार जैसे ही है.. फाल्गुनी, तू भागकर नुक्कड़ की दुकान पर जा और सबके लिए आइसक्रीम लेकर आ.. इन्ही पैसों से हम सब पार्टी करेंगे.. ठीक है ना !!”

मौसम और फाल्गुनी दोनों आइसक्रीम लेने गए.. कविता और वैशाली बातें करने लगे.. बरामदे की कुर्सियों पर सब झुंड बनाकर बैठे थे.. सब का ध्यान बातों में था तब पीयूष ने अंधेरे का फायदा उठाते हुए शीला का हाथ पकड़ लिया.. शीला मदन को याद करते हुए बेचैन हुए जा रही थी और उसे वैसे भी किसी के सहारे की जरूरत थी.. शीला और पीयूष पीछे की कुर्सी पर बैठे थे और बाकी सबकी पीठ उनके तरफ थी इसलिए किसी ने देखा नहीं था.. शीला के हाथों का नरम गरम स्पर्श मिलते ही पीयूष के मन का मोर नाचने लगा.. शीला को भी मज़ा आ रहा था..

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अचानक पीयूष का हाथ छुड़ाकर शीला खड़ी होकर बोली “ये दोनों आइसक्रीम लेकर आती ही होगी.. मैं बाउल लेकर आती हूँ” पीयूष निराश हो गया.. तभी अंदर से शीला की आवाज सुनाई दी.. “अरे पीयूष.. जरा अंदर आना.. ऊपर से बॉक्स उतारना है.. मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा”

“आया भाभी.. ” कहते हुए पीयूष दौड़कर किचन में पहुँच गया.. बॉक्स तो पहले से ही नीचे उतार चूकी थी शीला.. शीला ने पीयूष को अपनी बाहों में भर लिया.. और आठ-दस किस कर दी उसके चेहरे पर.. पीयूष भी अपने पसंदीदा स्तनों को दबाने लगा.. मात्र ५ सेकंड में ये सारा खेल निपट गया.. पीयूष तुरंत भागकर बाहर आ गया ताकि किसी को शक न हो.. शीला भी कांच के बाउल लेकर बाहर आई तब तक मौसम और फाल्गुनी आइसक्रीम लेकर आ चुके थे

फेमिली पेक को खोलकर पीयूष ने छोटी छोटी स्लाइस काटकर सब के लिए बाउल तैयार कीये.. सब बातें करते हुए आइसक्रीम का लुत्फ उठाने लगे.. बातों बातों में पीयूष ने शीला से पूछा

पीयूष: “आप भी साथ चलोगे न भाभी?” कविता भी कहाँ पीछे रहने वाली थी.. !! उसने संजय को कहा

कविता: “जिजू, आपको तो चलना ही होगा.. आप के बगैर मज़ा नहीं आएगा”

पीयूष को इतना गुस्सा आया कविता पर.. !! ये कविता मेरे सारे प्लान की माँ चोद रही है.. साला ये संजय कौनसा अपना सगा है जो तुझे उसके बगैर मज़ा नहीं आएगा !!!

लेकिन कविता ओर कोई दांव खेल पाती उससे पहले ही शीला ने आने से मना कर दिया और संजय ने भी कह दिया की उसे ऑफिस का काम कभी भी आ सकता था इसलिए वह जुड़ नहीं पाएगा.. वैशाली और पीयूष के चेहरे चाँद की तरह खिल उठे.. कविता भी यह सोचकर खुश हो रही थी की आखिर पीयूष शीला से दूर रहेगा और टूर पर साथ होगा तो कभी न कभी कोई मौका मिल ही जाएगा उसे.. सुबह जल्दी जाना था इसलिए सब अपने घर चले गए

शीला के घर से लौटने के बाद कविता देर तक पॅकिंग करती रही.. और फिर पीयूष की बगल में लेट गई.. पीयूष अभी सोया नहीं था.. अपने मोबाइल पर पॉर्न क्लिप देखते हुए.. चादर के नीचे मूठ लगा रहा था.. कविता ने अंगड़ाई लेकर अपने स्तन पीयूष की छाती पर लाद दिए.. “तेरे सामने मैं हूँ फिर तुझे हिलाने की क्या जरूरत है? यहाँ मर्सिडीज खड़ी है और तू साइकिल क्यों चला रहा है?”

पीयूष: “तू भले ही अपने आप को मर्सिडीज समझती रहे.. पर शीला भाभी के आगे तेरा कोई मोल नहीं है” कविता ने जिस तरह प्यार से संजय को न्योता दिया था उसका गुस्सा अब भी पीयूष के सर पर सवार था

खुद को महत्व न देते हुए पीयूष ने शीला की जिस तरह तारीफ की.. उससे सुलग गई कविता की.. बेडरूम में पति किसी पराई औरत के गुणगान करे ये कोई पत्नी सहन नहीं करती.. एक सेकंड में कविता के चेहरे का रंग बदल गया.. घूमने जाना हो तब पत्नी कितनी खुश होती है!! मन में ढेर सारे प्लान बन गए होते है.. यहाँ जाएंगे.. वहाँ जाएंगे.. शॉपिंग करेंगे.. फोटोस लेंगे.. अगले तीन चार दिन शायद मौका न मिले इसलिए वो आज पीयूष पर सवारी करके सारी कसर पूरी कर देना चाहती थी.. लेकिन पीयूष के मुंह से यह सुनते ही कविता बेहद गुस्सा हो गई।

कविता: “पीयूष, तू पहले ये तय कर की तुझे शीला भाभी ज्यादा पसंद है या वैशाली? बिना पेंदे के लोटे की तरह कभी माँ को दाने डालता है तो कभी बेटी को.. कितना खराब लगता है जब सब के सामने तू उन माँ-बेटी पर लट्टूगिरी करता है.. एक नंबर का चोदू लगता है”

पीयूष: “हाँ.. तुझे तो अब में चोदू ही लगूँगा ना.. जब से संजय को देखा है, तेरी भी नियत बदल गई है.. पर संजय ने वैशाली की क्या हालत कर दी है ये तुझे पता नहीं है.. एक नंबर का नालायक आदमी है संजय.. सिर्फ दिखने में हेंडसम है.. बाकी उसके लक्षण तो बंदरों जैसे है.. कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर.. “

कविता: “सभी मर्द यही करते है.. तू भी कौनसा दूध का धुला है?? पहले अपने गिरहबान में झाँककर देख.. फिर दूसरों की बात करना..!!”

संजय: “अरे वाह.. बड़ी वकालत हो रही है संजय की.. कहीं वो भड़वा तुझे पटाने की फिराक में तो नहीं?? मैं पहले ही बता दे रहा हूँ तुझे.. उस संजय से तेरा मेलझोल मुझे जरा भी पसंद नहीं है”

कविता: “आखिर बाहर आ ही गया तेरे अंदर का दकियानूसी मर्द.. पुराने खयालों वाले.. तू शीलाभाभी के साथ जो कुछ भी करता है.. उतना तो मैं संजय के साथ कर ही सकती हूँ”

पीयूष चोंककर : “मैंने ऐसा क्या गलत किया है शीला भाभी के साथ?”

कविता: “पर मैंने कब कहा की तूने कुछ गलत किया भाभी के साथ? मैंने तो बस एक बात कही “

पीयूष डर गया.. कहीं भाभी के साथ छुपा-छुपी खेलने में ऐसा न हो की कविता हाथ से चली जाए.. भाभी तो थोड़े दिनों में अपने पति की बाहों में छुप जाएगी.. मेरी तरफ देखेगी भी नहीं.. फिर कविता ने भी हाथ लगाने नहीं दिया तो ये लंड सिर्फ जड़ीबूटी कूटने के काम आएगा.. लेकिन अभी अगर उसने बात छोड़ दी तो उससे यह साबित हो जाता की उसके और शीला भाभी के बीच कुछ चल रहा है..

गुस्से में पीयूष मूठ लगाता रहा.. कविता भी रूठकर उलटी दिशा में करवट लेकर सो गई.. चार दिनों की कसर पूरी करने के खयाल पर पानी फिर गया.. दोनों अब एक दूसरे से कतराने लगे और बात नहीं कर रहे थे

रोज सुबह एक आदर्श पत्नी के तरह “गुड मॉर्निंग” कहकर वो पीयूष को जगाती.. पर आज तो उसने पीयूष की तरफ देखा तक नही.. साढ़े पाँच बजे उठकर वो अपने सास-ससुर के लिए चाय और खाना बनाने किचन में चली गई.. साढ़े छ बज गए लेकिन पीयूष अब भी सो रहा था। अनुमौसी को गुस्सा आया.. वह बेडरूम में जाकर पीयूष को झाड़ने लगे “जब कहीं बाहर जाना हो तो समय पर उठना सीख.. जल्दी उठ.. सात बजे तुम्हें पहुंचना है और अभी तक तू बिस्तर पर ही पड़ा है? बहु बेचारी कब से जागकर घर का काम निपटा रही है.. और तू यहाँ कुम्भकरण की तरह खर्राटे ले रहा है? “

मुंह बिगाड़कर पीयूष खड़ा हुआ और बाथरूम में घुस गया.. फटाफट तैयार होकर वो दो मिनट में बाहर आया.. उसे इतनी जल्दी बाहर आया देखकर अनुमौसी ने कहा “इतनी जल्दी तैयार भी हो गया? नहाया भी की नहीं? या सिर्फ मुंह धो लिया? ब्रश किया की नहीं ठीक से? हे भगवान.. ये आजकल के नौजवान.. कब सुधरेंगे??”

सबकुछ सुन रही कविता कुछ नहीं बोली.. वो मौसम और फाल्गुनी को कपड़े बेग में भरने में मदद कर रही थी.. उसने पीयूष की तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया.. वैशाली कब से तैयार होकर अपना बेग लिए उनके ड्रॉइंगरूम में बैठी थी

आखिर वह पाँच लोग दो ऑटो में बैठकर ऑफिस पहुंचे.. साढ़े सात बज गए पहुंचते पहुंचते.. आधा घंटा देर हो गई थी.. पूरा स्टाफ बस में बैठ चुका था.. बस उन्ही पाँच का इंतज़ार था.. माउंट आबू जाने के लिए लक्जरी बस रावण हुई.. बस में अब भी ८ सीट खाली थी.. जरा भी भीड़भाड़ नहीं थी.. सब बड़े उत्साह में थे और मज़ाक के मूड में भी..

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पिंटू को देखते ही कविता की सांसें थम गई.. पिंटू अपने एक सहकर्मी के साथ बैठा था.. और उसके बाएं तरफ की सीट पर कविता और पीयूष बैठ गए.. राजेश बस के आगे के हिस्से में खड़ा हुआ था.. रेणुका पिंक साड़ी में जबरदस्त लग रही थी.. बार बार वो पीयूष की तरफ देखकर स्माइल करती रही.. मौसम और फाल्गुनी तो बिल्कुल आखिर वाली सीटों पर जा बैठी.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थी.. अंदर अंदर बातें करते हुए वह दोनों बार बार हंस पड़ती..

उनकी हंसी की आवाज सुनकर राजेश का ध्यान मौसम की ओर आकर्षित हुआ.. तीरछी नज़रों से वह मौसम के कच्चे सौन्दर्य का लुत्फ उठाने लगा.. मौसम जब हँसती तब उसके गाल पर हसीन डिम्पल पड़ते.. देखकर ही राजेश फ़ीदा हो गया था.. बस जैसे जैसे आगे बढ़ती रही वैसे ही सारे प्रवासी रंग में आते जा रहे थे.. सब हंसी खुशी मज़ाक मस्ती कर रहे थे.. पीयूष और कविता को छोड़कर..

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कविता जबरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कान लाए बैठी थी लेकिन किसी से बात नहीं कर रही थी.. मन में सोच रही थी “ये चूतिये पीयूष ने सारे मूड का सत्यानाश कर दिया कल रात को.. सब मजे कर रहे है पर मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लग रहा” बोर होकर वो खड़ी हो गई और रेणुका के पास जाने लगी.. सीट से उठाते हुए उसका पैर पिंटू के पैर से टकरा गया.. अपने प्रियतम का स्पर्श होते ही वो खिल उठी..

तभी राजेश ने सब का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए यह घोषणा की

“साथियों, कल मेरी पत्नी का जन्मदिन है.. इसी खुशी में हम सब माउंट आबू जा रहे है.. कंपनी के सारे परिवारजनों के साथ साथ हमारे साथ तीन नए लोग भी शामिल है.. उनको हमारे साथ पराया न लगे ये सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है.. लेडिज एंड जेन्टलमेन, प्लीज वेलकम मिस वशाली, मिस मौसम एंड मिस फाल्गुनी”

सब ने ताली बजाते हुए उन्हे “हाई” कहा.. तीनों शर्मा गई और खड़ी होकर सबको थेंक्स कहने लगी.. मौसम का खिले गुलाब सा सौन्दर्य देखकर कई देखनेवालों की आहें निकल गई.. पूरी बस में जैसे सुंदरता का भूकंप आ गया जिसका एपीसेंटर थी मौसम.. !!!

सब से पहचान होते ही मौसम और फाल्गुनी अपने असली रंग में आ गई.. दोनों ने हंसी मज़ाक करते हुए पूरी बस में धूम मचा दी.. वैशाली भी अपने प्रॉब्लेम को भूलकर मौसम और फाल्गुनी के साथ जुड़ गई.. संजय की कड़वाहट भरी यादों को दूर हटाते हुए.. वह कुछ दिन आराम से जीना चाहती थी.. राजेश टीशर्ट और जीन्स में बहोत हेंडसम लग रहा था.. तो दूसरी तरफ रेणुका अपने गदराए जिस्म पर साड़ी ओढ़े बेहद सुंदर और परिपक्व लग रही थी..

एक बात वैशाली के ध्यान में आई.. कविता बार बार पिंटू की ओर देख रही थी.. वैसे उसके लिए ये अच्छा ही था.. कविता का ध्यान भटका हुआ रहेगा तभी तो वो पीयूष के साथ फ्लर्ट कर पाएगी.. !!!!

मौसम की कोयल जैसी आवाज से बस में बहार खिल गई थी.. उसकी कच्ची कुंवारी छातियाँ तो बस.. उफ्फ़.. कहर ढा रही थी.. बस में बैठे लोग अक्सर नजर चुराकर उन कच्चे अमरूदों का रसपान कर लेते थे.. पीयूष और पिंटू राजेश के साथ बैठकर आगे के कार्यक्रम के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे.. बड़ा ही मस्त माहोल था बस में.. रोमेन्टीक सा..

रेणुका सीट पर बैठे बैठे खिड़की से बाहर देख रही थी.. उसकी पारदर्शक साड़ी से नजर आती क्लीवेज को देखकर पीयूष ठंडी आहें भर रहा था.. बीच बीच में दोनों की नजर एक हो जाती तब एक प्यारी सी मुस्कान देकर रेणुका उसके और पीयूष के प्रेम सर्टिफिकेट को रीन्यु कर देती थी.. उस दिन पैसे लेने गया तब कितना मज़ा आया था रेणुका के साथ.. आह्ह.. जोरदार गरम चीज है मैडम तो.. !!

तभी पीयूष के मोबाइल पर मिसकोल आया.. वैशाली ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए किया था.. पीयूष ने उसकी ओर देखा.. वैशाली के मांसल जिस्म को रेत के ढेर में फैलाकर जिस तरह चोदा था वह याद आते ही पीयूष का उस्ताद हरकत में आ गया..

बस तेज गति से सड़क पर सरपट दौड़ रही थी.. गति और स्मृति के बीच जरूर कोई गहरा संबंध है.. ऐसा क्यों होता है की बस या ट्रेन के सफर में ही सारी गुजरी बातें याद आने लगती है ???

मौसम और फाल्गुनी के साथ बैठकर गप्पे लड़ा रही कविता का सारा ध्यान अपने बंदर जैसे शरारती पति के ऊपर ही था.. वो देख रही थी कैसे पीयूष कभी रेणुका को देखकर मुसकुराता तो कभी वैशाली की गांड को देखकर अपनी लार टपकाता.. बहोत गुस्सा आ रहा था कविता को.. तभी उसने पिंटू को देखा.. गोरे चिट्टे क्लीन शेव पिंटू को देखकर उसके गालों को चूमने का मन कर रहा था कविता को.. काश अगर यहाँ शीला भाभी होती.. तो पिंटू के साथ उसका कुछ न कुछ सेटिंग जरूर करवा देती.. बहोत प्रेक्टिकल थी शीला भाभी.. कविता के ह्रदय में अपनी प्रेमी को लेकर ख्वाहिशें जागने लगी.. काश कभी मुझे और पिंटू को अकेले घूमने जाने का चांस मिल जाएँ .. !! एक सीट पर साथ साथ बैठकर.. हाथों में हाथ डालकर.. उसके कंधे पर सर रखकर सोने की कल्पना करते हुई कविता भारी सांसें लेने लगी.. कितना क्यूट लग रहा था पिंटू..!!

हाइवे पर सरपट दौड़ती बस एक होटल पर आकर रुक गई “हम सब थोड़ी देर रुकेंगे.. जिन्हे फ्रेश होना हो वह जल्दी निपटाए.. हम चाय पीकर तुरंत निकल जाएंगे ताकि पहुँचने में देरी न हो.. आगे थोड़ा सा ट्राफिक भी होगा”

सब फटाफट वॉशरूम में घुस गए.. मौसम और कविता लेडिज टॉइलेट में चले गए.. इन हाइवे हॉटेलों के टॉइलेट में कैसी गंदी गंदी बातें लिखी हुई होती है!!! मौसम पेशाब करते हुए सब पढ़ रही थी.. एक मोबाइल नंबर लिखा हुआ था और उसके नीचे लिखा था “पूरी रात चूत चटवाने के लिए मुझे कॉल करे.. ” एक दूसरा वाक्य ऐसा था “मस्त चूत है आपकी.. मेरा लंड लोगी क्या?”

मौसम ने पहली दफा ऐसा सब पढ़ा था.. “लंड” शब्द बार बार पढ़ने का दिल कर रहा था उसका.. पेशाब कर लेने के बाद उसने बाकी सारी लिखाई भी पढ़ ली.. पूरे जिस्म में सुरसुरी चलने लगी उसके.. वो वापिस आकर बस में बैठ गई.. थोड़ी देर बाद फाल्गुनी भी आकर उसके पास बैठ गई.. पूरी बस खाली थी.. बस मौसम और फाल्गुनी ही थे बस में..

फाल्गुनी: “यार, लोगों में तमीज़ नाम की कोई चीज ही नहीं है.. !!”

मौसम: “क्यों? क्या हुआ?”

फाल्गुनी: “अरे बाथरूम गई तो रास्ते में एक आदमी बाहर खड़ा खड़ा ही पेशाब कर रहा था.. छोटा सा रास्ता था, मैं कैसे जाती? यार ये मर्द लोग न.. बिल्कुल बेशर्म होते है”

मौसम: “हाँ यार.. मैं भी अभी बाथरूम गई तब ऐसी गंदी गंदी बातें पढ़ी.. दीवार पर लिखी हुई”

तभी वैशाली आई और बातों में शामिल हो गई

वैशाली: “क्या हुआ? कौनसी गंदी बातों की बात चल रही है?”

मौसम और फाल्गुनी ने अपने अनुभवों के बारे में बताया.. वैशाली हंस पड़ी

वैशाली: “जो शब्द अभी तुम्हें गंदे लगते है.. वहीं शब्द बाद में तुम्हें बहोत रोमेन्टीक लगेंगे.. देखना तुम दोनों.. !! और फाल्गुनी.. तूने उस आदमी का देखा की नहीं?”

फाल्गुनी भोली बनकर बोली: “क्या देखा?”

वैशाली: “अरे उसका लंड यार.. और क्या? मर्दों की दोनों जांघों के बीच और क्या लटकता है?”

फाल्गुनी शर्मा गई “क्या दीदी आप भी.. !!”

गंदी गंदी बातें सुनकर मौसम और फाल्गुनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया था.. जीवन में पहली बार ये सब बातें सुन रही थी वह दोनों.. वैशाली ने अपने अनुभव का ज्ञान उन दोनों के बीच बांटा..

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वैशाली: “तुम दोनों अभी नादान हो.. पर एक बार लंड के संपर्क में आने के बाद उससे दूर नहीं रह पाओगी”

मौसम: “लगता है दीदी को जीजु की याद आ रही है”

फाल्गुनी हँसते हुए “हाँ दीदी.. अब क्या करोगी?”

वैशाली: “माउंट आबू जाकर कोई नया जीजु ढूंढ लूँगी.. और क्या.. हा हा हा हा हा.. !!”

थोड़ी देर में सब बस में वापिस आने लगे.. सब से पहले पीयूष आया.. उसे देखते ही वैशाली का मन ललचा गया.. उसके पीछे पीछे रेणुका बस में चढ़ी.. बस की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए रेणुका की चूचियाँ पीयूष की पीठ से दबकर रह गई.. पीयूष का दिल बाग बाग हो गया.. औरत के जिस्म का गरम स्पर्श.. और वो भी स्तनों का.. रेणुका ने पीयूष को सृष्टि का सबसे अप्रतिम सुख देकर मालामाल कर दिया था.. बस में बैठे किसी को भी इन दोनों के खेल के बारे में जरा सा भी अंदाजा नहीं था..

कविता पिंटू से बात करने का मौका ढूंढ रही थी.. यह ध्यान रखते हुए की पीयूष को उसके और पिंटू के बारे में भनक न लगे.. आज अगर शीला भाभी साथ होती.. तो अब तक उसकी और पिंटू की कोई न कोई सेटिंग तो करवा ही देती.. क्या करू? पिंटू अकेले घूम रहा है.. और मैं उसके साथ होने के लिए मर रही हूँ.. कल रात पीयूष ने दिमाग खराब कर दिया.. और अब ये समाज की लक्ष्मणरेखा मुझे पिंटू से दूर रखे हुए है.. मैं यहाँ नहीं आई होती तो अच्छा होता.. कम से कम पिंटू को सामने देखकर भी बात न कर पाने का दुख तो नहीं होता!!! प्रेमी के करीब होते हुए भी दूरी बनाए रखने की मजबूरी से बड़ा दुख कोई नहीं होता.. बस में सब मजे कर रहे थे.. सिर्फ कविता को छोड़कर.. पिछली सीट पर बैठे बैठे वैशाली.. मौसम और फाल्गुनी को सेक्स एज्युकेशन दे रही थी..

शीला घर पर अकेली थी.. एकांत मिलते ही उसके दिल में गुदगुदी सी होने लगती थी.. संजय सुबह ९ बजे तैयार होकर घर से निकला उसके बाद शीला ने सब से पहला फोन जीवा को किया.. पर हाय रे किस्मत.. !! जीवा काम से दूसरे शहर गया हुआ था.. शीला ने दूसरा फोन रूखी को किया.. रूखी शीला की आवाज सुनकर बहोत खुश हो गई..

रूखी: “कितने दिनों के बाद याद किया आपने भाभी.. आप तो जैसे मुझे भूल ही गए”

शीला: “ऐसा नहीं है रूखी.. मैं तो तुझे रोज याद करती हूँ.. पर घर पर सेटिंग भी तो होना चाहिए.. !! रूखी, मेरी हालत बहोत खराब है.. घर में इतने सारे झमेले है की क्या बताऊ!! अभी चार दिन का वक्त मिला है इसलिए तुझे फोन किया.. जीवा तो शहर से बाहर है.. मैं ये मौका गंवाना नहीं चाहती.. कोई दूसरा है तेरे ध्यान में?”

रूखी: “भाभी, अगर आप चाहे तो रसिक के बाबूजी के साथ.. “

शीला चोंक गई “तेरे ससुर के साथ.. ???”

रूखी: “हाँ हाँ.. रसिक का बाप मतलब मेरा ससुर ही.. और कौन!! मेरी और उनकी गाड़ी अब पूरे जोश के साथ निकल पड़ी ही.. जब घर में ही खूंटा मिल जाए तब भला बाहर ढूँढने की क्या जरूरत!!”

शीला: “रूखी नालायक.. एक नंबर की रंडी निकली तू तो.. अपने ससुर के साथ ही शुरू हो गई!! जीवा और रघु के लंड से जी नहीं भरता क्या तेरा??”

रुखी: “एक लोचा हो गया है भाभी.. मेरी सास कुछ दिनों के लिए बाहर गई हुई है.. मेरे ससुर उनके दोस्त के बेटे की शादी में गए हुए थे.. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जीवा को फोन करके बुला लिया.. मैं टांगें खोलकर जीवा के लंड के धक्के ले रही थी तभी बूढ़ा आ टपका और हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया उस चूतिये ने.. !!!”

शीला: “फिर क्या हुआ.. ??”

रूखी: “फिर क्या होना था.. जीवा को तो मैंने जैसे तैसे रवाना कर दिया.. पर बूढ़े ने कहा की मुझे चोदने दे.. वरना तेरा भंडा फोड़ दूंगा.. मैंने बहोत मना किया पर वो माना ही नहीं.. पर एक बात कहूँ भाभी.. बाहर के मर्दों को घर बुलाने में खतरा तो है.. आस-पड़ोस वाले देख लेते है.. हजार बातें होती है.. उससे अच्छा तो घर में ही जुगाड़ हो जाए वही बेहतर है.. ससुर बूढ़ा है पर है कमीना ताकतवर.. असली घी के जो बड़ा हुआ है”

शीला का गला सूखने लगा रूखी की बातें सुनकर.. “फिर क्या हुआ? बूढ़े के साथ मज़ा आया तुझे? जीवा जैसा मज़ा तो नहीं आया होगा !!”

रूखी: “भाभी, थोड़ा बहोत ऊपर नीचे चलता है.. पर इसमे पकड़े जाने का कोई डर नहीं.. पूरा दिन घर में जैसे मर्जी, जितनी मर्जी बस चुदवाते रहो.. कल तो मेरे ससुर ने पूरा दिन मुझे कपड़े ही नहीं पहनने दिए.. मुझे कहता है की “रूखी, तुझे नंगी देखना बहोत अच्छा लगता है.. कपड़े तेरे शरीर पर जचते ही नहीं है.. ” और तो और भाभी, पूरा दिन जब में घर का काम करता हूँ तब वो यहाँ वहाँ उंगली करता रहता था.. सच कहूँ भाभी.. मुझे तो बहोत मज़ा आया”

शीला: “ये सब अभी के लिए तो ठीक है.. पर जब तेरी सास वापिस आ जाएगी फिर क्या करोगे तुम दोनों?”

रूखी: “अरे मेरी सास तो सुबह २ घंटे मंदिर जाती है तब मैं मेरे ससुर के साथ निपटा लूँगी.. ये सब करने के लिए वक्त चाहिए कितना.. एक घंटा तो बहोत हो गया मेरे लिए”

रूखी की बातें सुनकर शीला की चूत में खुजली होने लगी..

शीला: “यार रूखी, मुझे तो तुम दोनों को चोदते हुए देखना है.. अभी तेरा ससुर घर पर है क्या? मैं देखना चाहती हूँ.. ससुर और बहु के बीच का सेक्स.. करते हुए तुझे शर्म नहीं आई थी क्या?”

रूखी: “भाभी, वो अभी बाहर बीड़ी का बंडल लेने गया है.. आता ही होगा.. बीड़ी पीते पीते अपना लंड मेरे हाथ में दे देगा”

शीला: “मैं एक काम करती हूँ.. अभी तेरे घर पर आती हूँ.. जैसे ही तुम दोनों का कार्यक्रम शुरू हो जाए, तू मुझे मिसकोल कर देना.. और हाँ दरवाजा सिर्फ अटकाकर ही रखना.. कुंडी मत लगाना.. और तेरे ससुर को पूरा नंगा कर देना.. मैं अचानक दरवाजा खोलकर आऊँगी.. और तुम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लूँगी.. और फिर शामिल हो जाऊँगी.. जो दांव उसने तेरे और जीवा पर आजमाया वहीं दांव से हम बूढ़े को फँसायाएंगे”

रूखी: “मुझे कोई दिक्कत नहीं है भाभी.. आप आ जाइए”

शीला: “अरे मैंने तो घर को ताला भी लगा दिया.. थोड़ी ही देर में पहुँच जाऊँगी” शीला ने हाथ ऊपर कर रिक्शा को रोका और अंदर बैठ गई.. रिक्शा में बैठे बैठे उसने अपनी सुलगती चूत को घाघरे के ऊपर से ही मुठ्ठी में भरकर दबा दिया.. तब जाकर वह थोड़ी शांत हुई.. इतनी तेज खुजली हो रही थी.. रहा नहीं जा रहा था शीला से..

तभी रूखी का कॉल आया

रूखी: “भाभी, वो आ गए.. फोन रखती हूँ.. मेरा मिसकोल देखते ही आप अंदर चले आना”

अगले दस मिनट में शीला रूखी के घर के बाहर खड़ी थी.. उसने धीरे से दरवाजा खोला.. रूखी का मिसकोल अभी आया नहीं था.. पर शीला से रहा ही नहीं जा रहा था.. मुख्य कमरे से गुजरते हुए वह दूसरे कमरे के दरवाजे के पीछे सटकर अंदर का नजारा देखने की कोशिश करने लगी.. अंदर का द्रश्य देखकर शीला के भोसड़े में १०००० वॉल्ट का झटका लगा..

To Be Continue….

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