अब Maa Bete Ki Chudai की कहानी को आगे सुरुवात करते है…..
“सुनो….” दरवाजे के हैंडल को पकडे वो वहीँ पर रुक गया। “तुमने अभी अभी मुझे चोदा है कम से कम मुझे अपना नाम तो बताकर जाओ…” मगर वो कुछ नहीं बोला और उसने दरवाजे का हैंडल घुमाया। मुझसे रहा नहीं गया। “तुम डर क्यों रहे हो? तुमने चोरी से मेरे रूम में घुसकर जबरदस्ती मेरी चुदाई की है मगर मेने तुम्हे कुछ नहीं कहा बल्कि तुम्हारा पूरा साथ दिया है। फिर इस तरह घबरा कर भाग क्यों रहे हो।” वो फिर भी कुछ नहीं बोला। शायद वो मन में हालात का जायजा वे रहा था। मैं उसे अभी जाने नहीं देना चाहती थी। और उसे रोकने के लिए उसे विस्वास दिलाना जरूरी था के मैं उसका पकड़वाने वाली नहीं थी।
“देखो अगर मेने तुम्हे पकड़वाना होता तो में तुम्हे कब की पकड़वा चुकी होती…….तुम्हे खुद इस बात बात का एहसास होना चाहिये। तुम बेकार में डर रहे हो।” वो कुछ पल खड़ा अँधेरे में सोचता रहा और फिर जैसे उसने फैसला कर लिया। उसने हैंडल घुमाया। मैं बेड से नीचे उतरी। कैसा गधा है यह, मैं इसे निमत्रण दे रही हूँ और यह भाग रहा है|
“देखो रुको…..जाने से पहले मेरी बात सुनलो” उसके हाथ वहीँ ठिठक गए। अब आखिरी मौका था उसे रोकने का। “देखो मुझे लगता है तुम जानते हो के मैं कौन हूँ और तुम मुझे पहचानते हो…..लेकिन मुझे नहीं मालूम तुम कौन हो नाही मैं तुम्हे पहचानती हूँ और अगर तुम बताना नहीं चाहते तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है। मैं तुमसे नहीं पूछूंगी।” इस बार मेरे शब्दों ने असर दिखाया और उसने हैंडल छोड़ दियाऔर वो मेरी तरफ घूम गया। “जो सुख जो आनंद आज तुमने मुझे दिया है मेरे पति ने आज तक मुझे नहीं दिया। इतना मज़ा…..इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया।”मैं चलते चलत्ते उसके पास पहुच गयी थी। हम दोनों आमने सामने थे। “मैं तुम्हारा सुक्रिया अदा करना चाहती थी। तुम्हारा नाम इसलिए पूछ रही थी के अगर बाद में कभी……कभी भी…….मेरा मतलब है अगर कभी फिर से तुम्हारा दिल करे तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है” मैं सिसकती आवाज़ में बोली। अब वो मेरी बात सुन रहा था और वहां से जाने के बारे में भूल चूका था। मेने अपना हाथ आगे बढाकर उसके सीने पर रखा और फिर उसे नीचे की और ले जाने लगी। उसकी सांसो की रफ़्तार तेज़ हो रही थी। शायद वो भी अभी वहां से जाने का इच्छुक नहीं था। मगर अपना भेद खुलने से डर रहा था। मेरा हाथ जब पेंट की जिपर पर गया तो वहां पर हलकी सी हलचल देख कर मेरे होंठो पर मुस्कान आ गयी। मेने धेरे से पेंट की जिपर नीचे खींच दी। और उसके जांघिये में हाथ डालकर उसका कड़क होता लण्ड पकड़ लिया। मेरा हाथ लगते ही वो सिसक उठा।
“तुम्हारा यह बहुत बड़ा है…..बहुत मोटा है…….लंबा भी खूब है……मुझे नहीं मालूम था यह इतना बड़ा भी हो सकता है” मैं लण्ड को मसलते बोली जो अभी भी मेरी चूत के रस से भीग हुआ था। । लण्ड तेज़ी से अकड़ता जा रहा था। “उफ्फ्फ्फ़ यकीन नहीं होता इतना मोटा लण्ड मेरी चूत के अंदर था…….बहुत ज़ोर से ठोका है तुमने मुझे……मेरी चूत में चीस उठ रही है” में आग में घी डालते बोली। उसकी सांसो की रफ़्तार मुझे बता रही थी के वो कितना उत्तेजित है। वो धीरे धीरे मेरे हाथों मैं अपना लण्ड ठेल रहा था। “सुनो…..मेरे पति आज रात आने वाले नहीं है……अगर तुम कुछ देर और रुकना चाहो तो……” वो कुछ नहीं बोला। मेने उसके लण्ड से हाथ हटाये और उसके हाथ पकड़ अपने मम्मो पर रख दिए। वो मेरे निप्पलों को मसलने लगा और में उसकी पेंट की बेल्ट खोलने लगी। उसकी पेंट और जांघिया खुलते ही उसने अपना चेहरा झुक्या और मेरे निप्पल को होंठो में भरकर चुसकने लगा। में फिर से उसका लण्ड मसलने लगी। वो मेरे मम्मो को चूस्ता चाटता उन्हें दांतो से काट रहा था और में उसे रोक नहीं रही थी।
कुछ देर उससे मम्मे चुसवा कर मेने उसका चेहरा अपने सीने से हटाया और उसके पैरों के पास घुटनो के बल बैठ गयी। मैं जीभ निकाल उसके लण्ड को चाटने लगी। उसकी सिसकारियाँ गूंजने लगी। अब वो मेरे बस में था। सुपाड़े को अपनी जिव्हा से रगर रगड़ कर लाल करने के बाद मेने उसे अपने मुंह में भर लिया और उसे चूसने लगी। में अपना मुख हिलाती लण्ड को खूब मज़े से चुसक रही थी। अब उसका लण्ड फिर से अपने भयन्कर रूप को धारण कर चूका था। मुझसे इंतज़ार नहीं हो रहा था और उस अजनबी से भी नहीं। उसने मेरे कंधे पकड़ मुझे उठाया। मैं खड़ी हो गयी और हमारे होंठ मिल गए। मुझे चूमते हुए उसने मेरी एक टांग उठा ली और मेरी चूत पर लण्ड दबाने लगा। मेने लण्ड को हाथ से पकड़ रास्ता दिखाया। अगले ही लण्ड का सुपाड़ा चूत में था। में उत्तेजना में उसके होंठ काटने लगी। मेने अपनी टांग उसकी कमर पर लपेट दी और अपनी बाहें उसके गले में डाल दी। उसने एक हाथ से मेरी टांग को उठाया और दूसरे को मेरी पीठ पर लपेट मेरी चूत में लण्ड पेलने लगा। वो मुझे ठोकने लगा और मैं फिर से ठुकने लगी। हम दोनों एक दूसरे के मुंह में सिसक रहे थे। दोनों चुदाई में एक दूसरे की सहायता कर रहे थे। उसका मोटा लण्ड मेरी चूत में खचाखच खचाखच अंदर बाहर हो रहा था।
“कहीं तुम वहीँ तो नहीं जो डांस के समय बार बार मेरे मम्मो को मसल रहा था और मेरी गांड में ऊँगली डाल रहा था।” मगर उसने कोई जवाब नहीं दीया। वो बस लगातार मुझे चोदे जा रहा था जेसे उसे यह मौका दुबारा नहीं मिलने वाला था। मेने उसे दुबारा नहीं पूछा। कहीं वो डर कर चुदाई बंद न कर दे। मुझे भी ऐसा कड़क लण्ड शायद दुबारा नहीं मिलने वाला था इसीलिए मेने भी मौके का पूरा फायदा उठाने की सोची और मस्ती में खुल कर चुदवाने लगी। हर धक्के का जवाब में भी बराबर ज़ोर लगा कर दे रही थी। पूरी मस्ती में ठुकवा रही थी।
“ओह्ह्ह गॉडडडडड……..ऊऊफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्…………पेलो……कस कस कर अपना लण्ड पेलो। ऊऊफ़्फ़फ़्फ़ ऐसे ही चुदवाने के लिए में तड़फती थी। और ज़ोर से……और ज़ोर से……हाययययययय……ऊउन्ननगहह्ह्ह् मेरी चूत…..मेरी चूत……चोदो मुझे….” मेरी बातें उसके जोश को दुगना चुगना कर रही थी। फिर यकायक वो रुक गया और मुझसे अलग हो गया। शायद वो आसान बदलना चाहता था। उसने मुझे घुमाया और मेरे सर को नीचे की और दबाने लगा। मुझे समघने में देर न लगी और में तरुन्त बेड के किनारे को पकड़ झुक कर घोड़ी बन गयी। उसने पीछे से मेरी कमर को पकड़ा और अपना लण्ड पूरे ज़ोर से मेरी चूत में घुसेड़ दीया
“आआईईईईईई……..ऊऊन्नन्नह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्…………हाय बेदर्द…….ऊऊन्नन्नह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हूऊफ़्फ़्फ़्…….चोद मुझे…….ऐसे ही कस कस कर पेल अपना लौड़ा मेरी चूत में…….” मैं घोड़ी बनी चीखती अपनी चूत उसके लण्ड पर धकेल रही थी। वो भी पूरा ज़ोर लगा रहा था। एक एक धक्का खींच खींच कर लगा रहा था। पूरा लण्ड चूत को चीरता जड़ तक अंदर बाहर अंदर बाहर हो रहा था। इस तेरह पीछे खड़े होकर मेरी कमर को पकड़ कर उसे धक्के लगाने में आसानी हो रही थी और वो मज़े में अपना पूरा ज़ोर लगाता मुझे पेले।जा रहा था। और मैं सिसकती कराहती बेशर्मी से उसे उकसा रही थी। मेरे अति अश्लील शब्द् सुन कर जोश में वो मेरी चूत की ऐसी तैसी कर रहा था। उस कमीने की उस ज़ालिम चुदाई में इतना आनंद था के मैं बहुत देर तक रुक न सकी और फिर से मेरी चूत झड़ने लगी।
बेड की चादर को मुट्ठियों में भींच मैं चीख रही थी और वो दे दनादन मेरी चूत में लण्ड पेले जा रहा था। कुछ देर बाद वो भी ऊँचे ऊँचे सिसकने लगा। धक्को की रफ़्तार बहुत बढ़ गयी थी। अब किसी भी पल उसका छूटने वाला था। मैं अपनी चूत में उसके रस की बौछार का इंतज़ार कर रही थी के अचानक कानो को भेद देने वाला शोर सुनाई दिया। हम दोनों रुक गए। वो फायर अलार्म था। मैं घबरा कर उठी और दौड़ कर दरवाजे के पास गयी और लाइट का स्विच ढूंढने लगी।
“नहीं रुको, लाइट मत जलाओ।” वो घबराई मगर बेहद जानी पहचानी आवाज़ मेरे कानो में गूंज उठी। मगर देर हो चुकी थी। उसके बोलने से पहले ही में स्विच ऑन कर चुकी थी। कमरा रौशनी से जगमग उठा। और फिर मेने उस अजनबी को देखा।
उस अजनबी को देखते ही मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गयी। वो कोई और नहीं था,राज था जो कुछ क्षण पहले मुझे घोड़ी वनाकर चोद रहा था। मेरा अपना बेटा मेरे सामने पूरा नंगा खड़ा था। मेरी सारी सोच समझ जवाब दे गयी। मैं क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था।
था। मेरा बेटा मेरे सामने नंगा खड़ा था और उसका मोटा लम्बा लण्ड मेरी आँखों के सामबे ऊपर नीचे हो रहा था और वो मेरे पूरे जिस्म को फटी फटी आँखों से देख रहा था।
“राज….यह तुमने क्या……” मेरी बात पूरी न हो सकी। उसके लण्ड से तेज़ ज़ोरदार वीर्य की पिचकारी सीधी मेरी नाभि पर आकर गिरी और उसका रस बहकर नीचे मेरी चूत की और जाने लगा। मैं स्तब्ध सी देख रही थी के दूसरी फुहार निकल कर एकदम सीधी मेरी चूत से टकराई।
“ओह्ह्ह्ह्ह्……” राज के मुंह से सिसकी निकल गयी। राज की नज़र मेरी चूत पर जमी हुयी थी और उसके लण्ड से वीर्य की तेज़ फुहारे मेरी चूत को नहला रही थी। अचानक मुझे होश आया। मैं घूमी और फटाफट बाथरूम की और भागी। मेने भढाक से दरवाजा बंद कर दिया।
“अपने कपडे पहनो और जाओ देखो क्या हुआ है। मैं आती हूँ अभी। जल्दी करो।” मेने एक सेकंड बाद हल्का सा दरवाजा खोल उसे कहा और फिर से दरवाजा बंद कर दिया।
मेने शावर खोला और अपने चेहरे को हाथों से ढक कर अपने अंतर में चल रहे मनमंथन को शांत करने का प्रयास करने लगी। कुछ ही क्षणों में इतना कुछ घट चूका था के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। वो ‘अजनबी’ मेरा पति नहीं था इस बात का आभास तो मुझे उसी क्षण हो गया जब उसका लण्ड मेरी चूत के अंदर घुसा था मगर वो मेरा अपना बेटा निकलेगा इसकी तो मेने कल्पना तक नही की थी। ‘मगर यह हुआ कैसे ? वो आखिर मेरे कमरे में कैसे आया? उसे मालूम नहीं था के वो उसकी माँ का कमरा है? उसे मालूम नहीं चला के वो अपनी ही माँ को चोद रहा है? आखिर यह हुआ कैसे? उसने मेरी आवाज़ को क्यों नहीं पहचाना?” हर पल दिमाग़ में नया सवाल कोंध रहा था और मेरे पास एक भी सवाल का जवाब नहीं था। में पानी से बदन को रगड़ रगड़ कर साफ़ करने लगी जैसे उस गुनाह का हर सबूत मिटा देना चाहती थी जो मैंने अपने बेटे के साथ मिलकर किया था और जिसके गवाह हम दोनों थे। मेरा हाथ चूत पर गया तो पूरा बदन सनसना उठा। उसके रस से पूरी जांघे भरी पड़ी थी।
मेने अपनी जांघे खोल पानी की धार को अपनी चूत पर केंद्रित किया। मेरा पूरा हाथ चिपचिपा हो गया था। बहुत ही गाढ़ा रस था एकदम मख्खन की तेरह। मेने अपनी दो उँगलियाँ चूत के अंदर घुसाई तो मेरा हाथ फिर से भर गया। ‘उफ्फ्फ नजाने कम्बखत ने कब से जमा करके रखा था। पूरी चूत लबालब भरी पड़ी है।’ कोई पांच मिनट की मेहनत के बाद में बेटे की चिकनाई को धो सकी। मेने घूम कर पीठ को भी साफ़ करना चाहा के तभी मेरी नज़र बाथरूम के शीशे पर पड़ी। शीशे पर ऊँची ऊँची लाल लपटे नाच रही थी। अचानक से मुझे होश आया। फायर अलार्म फालस नहीं था जैसे मुझे सुरु में लगा था। सच में आग लगी हुयी थी।
मैंने तुम्हारे डैड को नही बताया इसका मतलब यह नही के मैंने तुम्हे माफ़ कर दिया है। चाहे तुमने मेरा बेटा होते हुए मेरे साथ बहुत गंदी हरकत की है मगर मैं माँ होने का फ़र्ज़ नहीं भूल सकती।। लेकिन अब मुझसे ज्यादा उम्मीद मत करना। अब मैं तुम्हारी माँ सिर्फ तुम्हारे बाप के सामने हूँ। मुझे नहीं लगता मैं तुम्हे कभी मुआफ़ कर पायुंगी”
उस दिन के बाद मैंने अपने बेटे से दूरी बना ली थी। मैं एक माँ का फ़र्ज़ जरूर पूरा कर रही थी। उसका खाना बनाना, कपडे धोना इत्यादि काम मैं उसके जरूर कर रही थी मगर माँ के प्यार और स्नेह से उसे मेने पूरी तरह वंचित रखा था। मैंने हम दोनों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर ली थी जिससे हम दोनों एक ही घर में रहते हुए भी अलग कर दिया था। अब हम दोनों में लगभग ना के बराबर ही बातचीत होती थी। जब कोई बेहद जरूरी बात होती तो मैं उसे बुलाती थी। जैसे दो दिन पहले मैंने उसे पॉकेट मनी के बारे में पूछा था और उसने इंकार में धीरे से सर हिला दिया था के उसके पास पैसे नहीं थे और इसके बाद मैंने उसे कुछ रूपये जेब खर्च के लिए दिए थे। क्योंके घर का खर्च और हिसाब किताब सब मेरे पास होता था और उसकी जरूरते भी में ही पूरी करती थी। लेकिन रात को एक अजनबी मेरे सपनो में आता और वो मुझे उत्तेजित कर देता लेकिन में उस सपने को नजरअंदाज कर देती, में जानती थी वो अजनबी कौन हे।
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अब दूरी तो उसने भी मुझ से बना ली थी। मैंने तो जरूरत पड़ने पर दो तीन बार उसे बुला ही लिया था मगर उसने एक बार भी बात करने की कोशिश नहीं की थी। पैसे न होने पर भी उसने मुझसे मांगे नही थे। मगर एक दूसरे से बात न करने की हमारी वजह अलग अलग थी। मैं उसे उसकी करतूत के लिए सजा दे रही थी जबके वो अपना बचाव कर रहा था। वो इस बात की पूरी कोशिश करता था के हमारा आमना सामना कम से कम हो जा बिलकुल ना हो। सुबह कॉलेज को जाना और कॉलेज से सीधा घर आना। खाना खाने भी वो हमारे बुलाने के बाद ही आता था। अपने बाप से भी बेहद कम बोलता था। यहाँ तक के उसने कॉलेज के सिवा और कहीं जाना बिलकुल बंद कर दिया था। पहले वो रोजाना अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने जाता था, हफ्ते में एक दो बार सिनेमा देखने जा फिर यूँ ही कहीं घूमने चले जाना जैसे आजकल जवान छोकरे करते हैं। लेकिन नहीं, उसने कॉलेज के सिवा सब बंद कर दिया था। मुझे लगता था सायद उसे इस बात का डर था के कहीं मैं किसी बात पर उससे गुस्सा न हो जायुं और उसके बाप के सामने उसकी पोल ना खोल दू। मेरी नाराज़गी तो वो यकीनन किसी भी हालात में नहीं चाहता था। या फिर शायद वो बात के ठंड पड़ने के इंतज़ार कर रहा था और उसकी यह शराफत वकती तौर पर उसका ढोंग मात्र थी।
वजह कुछ भी हो मगर हम दोनों के एक दूसरे से इस तरह कट जाने से घर में एक दम नीरसता छा गयी थी। असहनीय शांति और भयानक चुप्पी से हमारा घर घर ना होकर समशान लगने लगा था। कभी कभी तो मुझे डर लगने लगता था। बेटा घर में होता भी तो अपने कमरे से बहार नही निकलता था और मैं उसके कमरे में जाती नहीं थी। मैं जाती थी उसका बिस्तर बनाने जा फिर गंदे कपडे उठाने, मगर तभी जब वो कॉलेज गया होता। वो बंद कमरे में क्या करता था मैं नहीं जान सकती थी। अपनी पढ़ाई कितनी करता था, सोता कितना था जा फिर इंटरनेट पर ब्लू फिल्म्स देखता था जा अश्लीक सहित पढ़ता था, मेरे पास जानने का कोई मार्ग नहीं था। उसके कमरे से हालांके मुझे ढूंढने पर भी कोई आपत्तिजनक चीज़ नहीं मिली थी और पासवर्ड प्रोटेक्टर होने के कारन उसका कंप्यूटर तो मैं चला नहीं सकती थी।
एक महीना बीत चूका था और अब मुझे चिंता होने लगी थी। उसकी इतनी बड़ी हरकत के बाद मेरा उससे इतनी कठोरता से पेश आना स्वाभाविक था मगर जिस तरह वो एकदम से एकाकी जीवन ब्यतीत करने लगा था वो सही नहीं था। मैंने तो सोचा था एक दो महीने उसे बात नहीं करुँगी, उसे थोड़ी बहुत सजा दूंगी मगर मुझसे ज्यादा तो वो खुद को सजा दे रहा था। मैंने उसे क्या डराना था उसने उल्टा मुझे डरा दिया था। हालांके मुझे पहले पहले उसकी यह चुप्पी ड्रामा लग रही थी, शायद वो दुखी होने का ढोंग करके मेरी सहानुभूति चाहता हो ऐसी सम्भावना बहुत थी। लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी जब उसके सवभाव में कोई बदलाव नहीं आया तो मैं उसके अंतर में झाँकने की कोशिश करने लगी। खाने के टेबल पर जब वो हमारे साथ बैठता तो मैंने उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। वो खाना भी खाता था तो चेहरा झुकाकर। नज़र तो वो मिलाता ही नहीं था। उसे देखकर कहना मुहाल था के वो एक्टिंग कर रहा है। इतनी सहनशीलता वो भी इतने लंबे समय तक धारण किये रहना बहुत ज्यादा मुश्किल है। मुझे अब लगभग यकीन हो चला था के वो ढोंग नहीं कर रहा था बल्कि वास्तव में वो बहुत डरा हुआ है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह था के क्या उसे अपने किये पर पछतावा है? अब उसने जो किया था उसके नतीजे से उसे डर लगना स्वाभिक ही था। ऊपर से मैंने उसे, उसके बाप का डर दिया था, घर से निकाले जाने का डर यकीनन बहुत बुरा होता है तो वो डरा हुआ था, खामोश था, इस मुश्किल घड़ी से किसी तरह बच निकलना चाहता था मगर लेकिन क्या वो अपने किये पर शर्मिंदा था? शर्मशार था मुझे नहीं लगता था वो पछता रहा है। अब मैं अजीब से संकट में फस गयी थी। अगर मैं उसका डर दूर नहीं करती तो मुझे चिंता थी कहीं वो किसी मनोरोग का शिकार न हो जाए और अगर मैं उसका डर दूर करने की पहल करती तो वो मुझे कमज़ोर मान सकता था और इतनी आसानी से बच निकलने पर बहुत संभव था वो दोबारा मुझे चोदने की कोशिश करता।
मैं कुछ फैसला करती उससे पहले मेरी मुसीबत का हल मेरे पति ने कर दिया। घर में हर वक़त छायी रहने वाली चुप्पी और हम दोनों माँ बेटे के बीच किसी बातचीत के न होने की और उनका धयान जाना स्वाभाविक ही था। वो गुरुवार का दिन था और हम जैसा लगभग पिछले एक महीने से चल रहा था, चुपचाप खाना खा रहे थे।
“कणिका, मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ तुम और राज आपस में बात नहीं करते। बिलकुल भी बात नहीं करते। क्यों? जबसे शादी से लौटे हैं घर में इतनी चुप्पी छायी हुयी है मानो यह घर नहीं कोई वीरान खंडहर है। आखिर बात क्या है?” अचानक से मेरे पति ने खाना कहते हुए मुझे पूछा तो मैं सकपका गयी। मैं अपनी सोच में गुम थी इसलिए अपने पती को क्या जवाब दूँ, मुझे कुछ सुझा नहीं।
“कुछ बात नहीं है, आपको यूँ ही लग रहा है।” मैंने बात टालते हुए कहा। मेरे दिल में एक बार भी यह ख्याल नहीं आया था के घर के माहोल की तरफ मेरे पति की नज़र भी जायेगी और वो इसकी वजह जानना चाहेगा।
“कुछ बात नहीं है। मुझे यूँ ही लग रहा है! तुम्हे क्या लगता है मुझे दिखाई नहीं देता जा मैं मुर्ख हूँ? तुम गुमसुम सी रहती हो और राज को तो मानो सांप सूंघ गया है। आखिर तुम दोनों में लड़ाई किस बात की है?” पतिदेव ने खीझकर पूछा। जरूर वह कई दिनों से देख रहे थे मगर चुप थे।
“उफ़्फ़्फ़्फ़ऊऊह्ह्ह्ह्ह्…………. कोनसी लड़ाई….किस बात की लड़ाई……..आपको ग़लतफहमी हुयी है। और आपने मुझे कब गुमसुम देख लिया।” मैं पतिदेव को झुठलाती बोली। लेकिन मेरी बात में दम नहीं था इसलिए इस बार वो अपने वेट से मुखातिब हुए।
“राज तुम्हारी माँ तो साफ़ झूठ बोल रही है, तुम ही बता दो आखिर बात क्या है? तुम दोनों आपस में बोल क्यों नहीं रहे हो?”
“पापा वो बात……..” बेटे की घिग्गी बंध गयी। वो मेरी तरफ देखने लगा।
“आप भी ना…….खामखाह बात का बतंगड़ बना देते हैं। अगले महीने उसके एग्जाम सुरु होने वाले हैं, उसका पूरा ध्यान पढ़ाई पर है और वैसे भी आपको मालूम तो है उस रात होटल में आग लगने के बाद…….” बोलते हुए मुझे झुरझुरी सी आ गयी। पतिदेव को ठंडा करने के लिए अब कुछ ढोंग तो करना ही था। मेरे पति पर तृन्त असर हुआ और उसने टेबल के ऊपर से मेरा हाथ पकड़ कर दबा दिया और मेरी और देखते हुए बड़े ही प्यार से मुस्करा दिए। मैंने मन ही मन चैन की साँस ली। ‘बला टली’। कुछ देर के लिए कमरे में फिर से चुप्पी छा गयी। मैंने बेटे की और देखा तो उसका चेहरा लाल हो गया था।
“यकीन नहीं होता तुम्हे एग्जाम की इतनी फिकर है” कुछ देर बाद पतिदेव ने बेटे जो मज़ाक करते हुए कहा तो मैंने उन्हें घूर कर देखा।
“खैर……..भगवन की कृपा से हम सभ उस रात बच गए और अब उसे याद कर कर परेशां क्यों होना। भूल जाओ उस रात को……..और वैसे भी मुझे इस तरह ख़ामोशी पसंद नहीं है, बेचैनी महसूस होती है। और बरखुरदार तुम…….तुम अपनी माँ का ध्यान रखा करो……अब मेरा तो पूरा दिन ऑफिस में निकल जाता है और अगर तुम भी अपने कमरे में बंद रहोगे तो तुम्हारी माँ का ख्याल कौन करेगा? इसलिए यह तुम्हारी जिम्मेदारी है के तुम अपनी माँ का ख्याल रखो। उसके काम में हाथ बंटाया करो…….उसे कहीं घुमा लाया करो…….कहीं शौपिंग वगेरह के लिए ले जाया करो……..उसका भी मन बहल जायेगा” मेरे पति बेटे को लंबा चौढ़ा भाषण देते बोले।
“जी पापा” बेटा धीरे से बोला।
“हुंह….और यह भीगी बिल्ली की तरह रहना, बोलना बंद करो…..मरद बनो मरद……..हम तुहारी उम्र में गर्दन अकड़ कर चलते थे और तुम…..जैसे जैसे तुम पर जवानी चढ़ रही है तुम ठन्डे पढ़ते जा रहे हो…….” मेरे पति बेटे का कन्धा थपथपा कर बोले। उसके गाल कुछ और लाल हो गए थे।
“हाँ हाँ..बहुत अच्छी बात है……आपका समझाने का तरीका तो ……..माशाअल्लाह……..आप क्या चाहते हैं वो पढ़ाई छोड़ कर आवारागर्दी करने लग जाये……..जी नहीं, वो जैसा है, बहुत अच्छा है।” मैं मुस्कराती पति को टोकती हुयी बोली।
“अरे बेगम साहिबा। यह उम्र पढ़ाई के साथ साथ मस्ती करने की भी होती है। तुम क्या चाहती हो वो बंद कमरे में सारा दिन किताबों के पन्ने ही पलटता रहे। ऐसा नहीं चलेगा……अरे जवानी में मरद बड़े बड़े किले फ़तेह कर लेता है……हमें देखो….हम क्या थे और आज क्या हैं……” मेरे पति खुद पर गर्व करते बोले। अब उन्हें क्या पता जिस बेटे को वो मर्दानगी का पाठ पढ़ा रहे है, उसी बेटे ने उसकी बीवी पर मर्दानगी की ऐसी छाप छोड़ी थी जितनी वो आज तक नहीं छोड़ पाये थे। अपने मोटे लंड के ऐसे ताबड़तोड़ धक्के लगाये थे के पूरी चूत सूज गयी थी।
“बस कीजिये…….बस कीजिये…..वर्ना मेरी हंसी निकल जायेगी….” मैं हँसते हुए पतिदेव को चिढ़ाते हुए बोली। तभी मेरा बेटा उठ खड़ा हुआ। सायद वो हमारी बातचीत के कारन असहज महसूस करने लगा था।
उस रात जैसे ही मैं काम खत्म कर अपने कमरे में गयी तो पतिदेव ने मुझ पर भूखे शेर की तरह झपट पड़े। मेरा नाईट सूट झटके से निकल कर कोने में फेंक दिया और फिर मुझे उठाकर बेड पर पटक दिया और फिर अपना पायजामा उतारकर छलांग लगा बेड पर मेरी टांगो के मध्य आ गए।
“क्या बात है आज तो बहुत उछल कूद लगा रहे हो?” मैं हंसती हुयी बोली।
“तुम्हे मेरी मर्दानगी की बातें सुनकर हंसी आती है…..हुंह…..अब तुम्हे दिखता हूँ जानेमन…..असली मरद क्या होता है”
“ओह तो जो आज तक दिखाया था वो क्या था……..” मेरी बात पूरी न हो सकी। पतिदेव की लपलपाती जीभ मेरी चूत के अंदर घुस गयी। उनके हाथ मेरे मम्मो को बुरी तरह निचोड़ने लगे। उफ्फ्फ्फ्फ़ क्या आनंद था। कुछ भी कहूँ, मेरे पति चूत चाटने में उस्ताद थे। उनकी खुरदरी जिव्हा जैसे ही मेरे भग से टकराई मेरे मुख से तेज़ सिसकारी निकली। फिर क्या था घूम घूम कर उनकी जिव्हा की तीखी नोंक मेरी चूत के दाने को रगड़ने लगी। मेरे हाथ खुद बा खुद पतिदेव के सर पर पहुँच गए और मैं उनका सर अपनी चूत पर दबाने लगी। कुछ ही क्षणों में मैं बुरी तरह कामोत्तेजित हो चुकी थी। चूत से रस बहने लगा था जिसे मेरे पतिदेव बड़े प्यार से चाट, चूस रहे थे। उनके हाथ मेरे तीखे अकड़े निप्पलों का खूब ज़ोरदार मर्दन कर रहे थे। उन्होने जोश में मेरी फूली हुयी चूत को पूरा मुंह में भर लिया और उसे ज़ोर ज़ोर से चूसने लगे।
मैं सिसयाती हुयी सर पटकने लगी। मेरा बदन ऐंठ रहा था। जल्द ही मैं सखलत होने वाली थी के तभी मेरे पतिदेव उठकर मेरी छाती पर स्वर हो गए। उन्होने मेरा सर पकड़ अपना लन्ड मेरे होंटो पर दबाया। मेरे होंठ खुलते ही उन्होने आधा लंड मेरे मुंह में घुसा दिया। अब मेरे पति जरूर चूत चाटने में उस्ताद थे मगर मेरे लन्ड चूसने के आगे उनकी कोई विसात नहीं थी। सुपाड़े को मुंह में दबा जब मैंने अपनी जिव्हा नरम कोमल तवचा पर रगड़ी तो पतिदेव आह आह करने लगे। मेरी जिव्हा की नोंक उनके मूत्र के छेद को कुरेदने लगी। मैंने एक हाथ से उनके टट्टे सहलाने सुरु कर दिए और दूसरा हाथ पीछे ले जाकर उनकी गांड में ऊँगली डालने लगी। अब मेरा मुंह तेज़ी से उनके लंड पर आगे पीछे हो रहा था और उसका सुपाड़ा फूलता जा रहा था। पतिदेव ने झटके से मेरा सर नीचे पटका और उठ कर वापस मेरी टांगो के मधय चले गए। उन्होने मेरी टांगे अपने कंधो पर रख ली और मेरे मम्मो को दबोच एक तेज़ ज़ोरदार झटका दिया।
“ऊँह्ह्ह्ह्ह्…….” लण्ड का सुपाड़ा अंदर घुसते ही मैं सिसक उठी। पतिदेव ने मम्मे भींच तीन चार करारे घस्से मरे और लन्ड पूरा अंदर घुसा दिया।
“ऊऊफ़्फ़फ़्फ़….क्या बात है आज तो बड़े पहलवान बन रहे हो”
“तुझे बहुत बातें आने लगी हैं……बहुत हंसी आती है मेरी मर्दानगी पर हुंह” पतिदेव हुंकारते हुए धक्के पर धक्का दिए जा रहे थे।
“ओह तो बदला ले रहे हैं……हाय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्यह……..” मेरे मुंह से तेज़ सिसकारी निकली। “हाय मर गयी कोई भला ऐसे भी बीवी को चोदता है…….अगर कहीं…..उंगग्ग्ग्ग्ग्ग्ग……मेरी चूत फट गयी तो…….”
“तेरी गांड है ना…..वो साली किस दिन काम आएगी……” पतिदेव के धक्के तेज़ होते जा रहे थे। चूत रस से इतनी भरी हुयी थी के लंड के अंदर बाहर होने का ऊँचा शोर पैदा हो रहा था।
“ख़बरदार जो मेरी गाँड के बारे में सोचा तक भी……वो तो हरगिज़ नहीं मिलेगी आप को” मैं भी नीचे से गांड उछालने की कोशिश कर रही थे मगर पति ने इस कदर दबोचा हुआ था के मेरे लिए गांड उछलना बहुत मुश्किल था।
“ऐसे नखरे तो तू शुरू से करती आ रही है मगर गांड तो तेरी मैं फिर भी ले ही लेता हूँ”
“अब नहीं दूंगी…..अगर ऐसे मारोगे जैसे अब मेरी चूत मार रहे हो तो गांड के बारे में भूल जाओ” मेरे पतिदेव हमेशा मेरी गांड के पीछे पड़े रहते थे मगर मुझे चूत मरवाने में ज्यादा आनंद आता था। आनंद तो गांड मरवाने में भी जरूर था मगर चूत जितना नही और उसमे पीड़ा भी बहुत होती थी।
“राज का जरा ख्याल करा कर……मुझे उसकी बहुत टेंशन रहती है” मेरे पति अचानक मुझे चोदते हुए बोल उठे।
“ख्याल तो रखती हूँ अब और क्या करूँ” पतिदेव ने भी क्या मौका चुना था बेटे की बाबत बात करने का।
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